Sunday, February 9, 2025

दिल्ली चुनाव 2025: बीजेपी की ऐतिहासिक जीत और विपक्ष की स्थिति

 


दिल्ली चुनाव 2025 के नतीजे आ चुके हैं और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने दिल्ली की राजनीति में एक नई लहर पैदा की है। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की स्थिति भी चर्चा का विषय बनी रही। आइए, इस चुनाव परिणाम का विश्लेषण करें और देखें कि विभिन्न दलों की हार और जीत के पीछे क्या कारण रहे।


1)     चुनाव परिणाम और मुख्य पार्टियों की स्थिति

Ø  भारतीय जनता पार्टी (BJP): बीजेपी ने इस बार बहुमत से जीत हासिल की। पार्टी ने अपने संगठित प्रचार अभियान, मजबूत नेतृत्व और केंद्र सरकार की नीतियों का लाभ उठाया।

Ø  आम आदमी पार्टी (AAP): AAP की हार इस बार चौंकाने वाली रही। सरकारी सेवाओं पर ध्यान देने के बावजूद, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक नीतियों को लेकर असंतोष पार्टी को भारी पड़ा।

Ø  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC): कांग्रेस ने कुछ सीटें जीतीं, लेकिन यह जीत पार्टी की पुरानी खोई हुई साख को वापस लाने में नाकाम रही। जमीनी स्तर पर संगठन की कमजोरी कांग्रेस के लिए नुकसानदायक रही।

Ø  ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM): इस चुनाव में AIMIM को सीमित समर्थन मिला। पार्टी ने कुछ क्षेत्रों में प्रभाव डाला, लेकिन राज्य की राजनीति में कोई खास बदलाव नहीं ला पाई।

2)     . मुख्य कारण जिन्होंने परिणाम को प्रभावित किया

Ø  BJP की आक्रामक चुनावी रणनीति: भाजपा ने हर वर्ग को साधने की कोशिश की और राष्ट्रवाद, कानून-व्यवस्था और विकास को चुनावी मुद्दा बनाया।

Ø  AAP की प्रशासनिक विफलताएँ: दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण, जल संकट और भ्रष्टाचार के आरोपों ने AAP की छवि को नुकसान पहुँचाया।

Ø  कांग्रेस की निष्क्रियता: कांग्रेस दिल्ली में अपना पुराना जनाधार वापस पाने में विफल रही, जिसका फायदा सीधे बीजेपी को मिला।

Ø  AIMIM का सीमित प्रभाव: पार्टी को कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में समर्थन मिला, लेकिन वह राज्य स्तर पर बड़ी ताकत बनने में असफल रही।

3)     . भविष्य की राजनीति पर प्रभाव

Ø  BJP की मजबूत स्थिति: बीजेपी की इस जीत से दिल्ली में उसकी राजनीतिक पकड़ और मजबूत होगी।

Ø  AAP के लिए आत्ममंथन का समय: AAP को अब अपनी नीतियों और प्रशासनिक कमियों को सुधारना होगा।

Ø  कांग्रेस के पुनरुद्धार की चुनौती: कांग्रेस को जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करना होगा।

Ø  AIMIM का सीमित दायरा: AIMIM को अन्य समुदायों का समर्थन हासिल करने के लिए अपनी रणनीति बदलनी होगी।

निष्कर्ष

दिल्ली चुनाव 2025 के नतीजे न केवल राज्य की राजनीति, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करेंगे। बीजेपी की ऐतिहासिक जीत से विपक्ष के लिए चुनौतियाँ बढ़ गई हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार अपने वादों को कैसे पूरा करती है और विपक्ष किस तरह अपनी भूमिका निभाता है।

जनता की आवाज ही लोकतंत्र की असली ताकत है!

 

Tuesday, January 28, 2025

IITian बाबा - मीडिया की सुर्खियों से कहीं आगे की चीज

जब से सोशल मीडिया हरेक हाथ में पहुँच गया है, तब से कौन सा व्यक्ति कब वायरल होकर प्रसिद्ध हो जाए, यह कहा नहीं जा सकता है। ऐसा ही एक व्यक्ति महाकुंभ 2025 शुरू होने के कुछ दिन बाद काफी ज्यादा वायरल हो गया है। IITian बाबा, जिनका असली नाम अभय सिंह है; हरियाणा के रहने वाले हैं और आईआईटी बॉम्बे से ग्रेजुएट हैं। उनके पेरेंट्स ने बताया कि उन्हें कनाडा में छत्तीस लाख का पैकेज मिल रहा था, लेकिन वो घर-परिवार और पैकेज सबकुछ छोड़कर कहीं चले गए। एक साल तक उनका कुछ पता नहीं चल और अब एक साल बाद वो एकाएक कुम्भ में फेमस हो गए हैं।


हम यहाँ खबरों की बात नहीं करेंगे। कुछ बातें हैं, जिनपर मुझे लगता है कि बात करना जरूरी है। पहली बात कि उन्होंने घर क्यों छोड़ा? उन्होंने सांसारिक जीवन क्यों छोड़ा? क्या वो हमेशा नशे में रहते हैं? उनके कुछ इंटरव्यू से उनका अभी का क्या विजन नजर आता है? अगर वो बाबा नहीं बनते तो क्या उनका समाज में योगदान ज्यादा होता या फिर कम? क्या अभय सिंह बाकी बाबाओं से अलग हैं? इन सारे प्रश्नों का जवाब हम एक-एक कर जानने की कोशिश करते हैं।



सबसे पहला प्रश्न कि उन्होंने अपना घर और सांसारिक जीवन क्यों छोड़ा? उनके कुछ इंटरव्यू से पता चलता है कि उनके पिता उनकी माँ को बहुत ज्यादा पीटते थे। वो अपनी माँ के लिए कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। कुछ समय बाद उन्हें पता चला कि उनकी किसी महिला मित्र के साथ भी उनका पति ऐसा ही दुर्व्यवहार करता है और वो इन सबके लिए कुछ नहीं कर सकते। इतनी पढ़ाई, इतना ज्ञान होने के बावजूद वो कुछ नहीं कर पा रहे थे। उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे जीवन में सबकुछ बेकार की छीजे हैं। अगर किसी के साथ भी ऐसी स्थिति या जाए तो उसे यही लगेगा कि जीवन में सबकुछ निरर्थक है। लेकिन घर और संसार का त्याग कर देना एक बहुत बड़ा फैसला है; यही मुश्किल निर्णय उन्होंने ले लिया और अपना जीवन वैराग की ओर मोड़ दिया। उनके इस वैराग के पीछे किसी और प्रेरणा से ज्यादा उनके घर और समाज का माहौल जिम्मेवार लगता है।

अगर उनके बोलने के ढंग को देखा जाए तो ऐसा लगता है, जैसे या तो वे डिप्रेशन में हैं या फिर काफी ज्यादा नशे में होते हैं। हो सकता है दोनों बातें गलत हों या फिर दोनों बातें सही हों। अगर सही हैं तो फिर इसके लिए जिम्मेवार कौन है? ऊपर ही हम चर्चा कर चुके हैं कि उनके घर का माहौल बचपन से ही काफी खराब रहा था। पिता माँ को बहुत ज्यादा पीटते थे। क्या हमारे घर का माहौल ऐसा होना चाहिए? आप कल्पना कीजिए कि हमारे समाज के आधे परिवारों का माहौल अभय सिंह के घर जैसा हो जाए और उस घर के आधे बच्चे भी वही निर्णय ले लें, जो अभय सिंह ने लिया है तो हमारे समाज की स्थिति क्या होगी? जिस सनातन के रक्षा की बात करते हम थकते नहीं, उसी सनातन धर्म का हरेक बच्चा अगर वैराग का रास्ता चुन ले तो फिर हमारे धर्म और समाज की हालत क्या होगी? एक काफी प्रसिद्ध लोकोक्ति है कि ‘भगत सिंह पड़ोस के घर में ही पैदा हों तो अच्छे लगते हैं’। हमें IITian बाबा इसीलिए अच्छे लग रहे हैं क्योंकि वो हमारे घर के नहीं हैं।

उनके कुछ इंटरव्यू से यह बात तो स्पष्ट है कि अभय ने भिन्न-भिन्न विषयों का काफी गहराई से अध्ययन किया है और उनमें काफी ज्ञान भरा हुआ है। वो अक्सर अध्यात्म को विज्ञान से जोड़ने की बात करते दिखाई देते हैं। उनका कहना कि हरेक विषय एक-दूसरे से लिंक्ड है और हमें इस बात पर चर्चा करनी चाहिए। इस बात से मैं भी बहुत हद तक सहमत हूँ। इसे एक छोटे-से उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। बताया जाता है कि शून्य की खोज आर्यभट ने की थी और इसके संकेत की खोज 628 ई. में ब्रहमगुप्त ने की थी। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि यह शून्य बौद्ध दर्शन के शून्यवाद से प्रेरित था। अर्थात उन विद्वानों ने दर्शन और गणित का आपस में संबंध दर्शाया है। कुछ ऐसी ही बातें करते IITain बाबा नजर आते हैं। उनका कहना है कि देश-विदेश से वैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री, धर्मज्ञ, राजनेता आदि इस महाकुंभ में आयें और अपने क्षेत्र का ज्ञान दूसरे क्षेत्र के लोगों के साथ बाटें; अपने-अपने तर्क रखें और फिर सभी के कनेक्शन को समझें। महाकुंभ का असली मतलब उनके लिए यही है। उन्होंने बताया कि वो स्वयं भी सभी लोगों से बात करने और उनके विचार जानने ही कुम्भ में आए थे लेकिन जब से वो फेमस हो गए हैं तब से उनका किसी से बात करना आसान नहीं रह गया है। इस मामले में उनका विजन और उनका ज्ञान काफी उच्च श्रेणी का लगता है। उनका विजन काफी दूरदर्शी जान पड़ता है। वास्तव में महाकुंभ एक स्नान से ज्यादा अगर ज्ञान के आदान-प्रदान का केंद्र हो जाए तो फिर बात ही क्या हो! खैर...

अगर वो बाबा नहीं होते तो उनका समाज में क्या योगदान होता? उन्होंने आईआईटी से शिक्षा ली है और अन्य विषयों की भी जानकारी उनकी काफी अच्छी है। तो मेरी समझ तो यह कहती है कि अगर वो तकनीकी क्षेत्र में बने रहते तो शायद उनका योगदान समाज और मानव जाति के लिए ज्यादा होता। अगर हम अपने देश के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की बात करें तो हम देखते हैं कि उन्होंने शादी नहीं की, सांसारिक जीवन में रहे और अपने ज्ञान का पूरा फायदा हमारे समाज को देकर गए। अगर अभय सिंह विदेश में रहकर भी कोई रिसर्च करते या तकनीक में कोई योगदान देते तो वो भी मानव कलयाणार्थ ही होता। अभी उनका विजन तो काफी अच्छा है लेकिन वो आम लोग, मीडिया और सोशल मीडिया के लिए एक मेटेरियल से ज्यादा नहीं हैं।

अब अंतिम प्रश्न पर बात करते हैं। क्या अभय सिंह बाकी बाबाओं से अलग हैं? इसका जवाब है हाँ बिल्कुल वो उन बाबाओं से अलग हैं जो अपने आप को काफी ज्ञानी और सनातन का ध्वजवाहक बोलते हैं। ऐसे बाबा आजकल न सिर्फ अपनी बातों से गंगा-जमुना तहजीब वाले देश में नफरत फैलाने की कोशिश करते नजर आते हैं, बल्कि तुरंत प्रसिद्धि पा लेने की भी ललक उनमें खूब नजर आती है। ऐसे बाबा या उनकी औडियो क्लिप आपको आमतौर पर इन्फ़लुनसर्स की रील्स में देखने को मिल जाती होगी। हाँ अभी भी बहुत सारे धर्मपरायण साधु हैं, जो नेपथ्य में रहकर सनातन की विचारधारा को प्रचारित करना अपना मूल कर्तव्य समझते हैं। लेकिन तत्काल प्रसिद्धि और धर्म के नाम पर ऊल-जुलूल बातें करने वाले धर्मगुरुओं की कमी आज किसी भी धर्म में नहीं है। अभय सिंह को मैंने एक इंटरव्यू में बोलते सुना कि आप मेरी बातें, मेरे विजन की बात करो न, आप क्यों मेरी बात लेकर बैठ जाते हो! लेकिन सच्चाई तो यह है कि हर कोई उन्हें ही देखना चाहता है, उनके विजन में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है; इसीलिए मीडिया वाले भी उनकी ही बातें कर रहे हैं न कि उनके विजन की।

तो कुल मिलकर यही कहा जा सकता है कि एक बहुत ही ज्यादा शिक्षित और ज्ञान से आप्लावित व्यक्ति जो किसी और जगह रहकर समाज को काफी कुछ दे सकता था, वो अपने घर के कलुषित माहौल के कारण वैराग के मार्ग पर चला गया और उस मार्ग पर भी अगर थोड़ा बहुत कुछ वो योगदान दे सकता था तो उस संभावना को मीडिया कुचलती नजर या रही है।


Sunday, January 26, 2025

DIVORCE RIGHT OR WRONG ?

 

अभी मीडिया और सोशल मीडिया पर खबरें उड़ रही हैं कि पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और उनकी पत्नी एक-दूसरे से अलग हो गए हैं। इस खबर के आते ही लोगों में एक बार फिर से हो-हल्ला सा मच गया है कि आखिर लोग क्यों एक-दूसरे से अलग होते जा रहे हैं? अगर भारतीय क्रिकेटर्स की बात करें तो शिखर धवन, दिनेश कार्तिक, मोहम्मद सामी, विनोद कांबली, रवि शास्त्री, यह सूची और भी लंबी है; इन सभी के या तो डिवोर्स हो चुके हैं या फिर ये अपने जीवनसाथी से अलग रह रहे हैं। इसी तरह अगर बात की जाए फिल्म स्टार्स की तो आमीर खान, सैफ आली खान, करिश्मा कपूर, हृतिक रोशन, फरहान अख्तर, अनुराग कश्यप और यह लिस्ट भी काफी लंबी है; इन्होंने भी अपने पार्टनर से अलग रहना चुन लिया है।


अब आते हैं मुद्दे की बात पर! भारतीय समाज में अभी भी डिवोर्स को एक पाप, कोई अपराध, या फिर किसी शाप की तरह देखा जाता है। क्या तलाक को इस तरह देखना उचित है? इसका जो जवाब मेरे पास है उससे शायद नब्बे प्रतिशत भारतीय लोग सहमत न हों। जब हम किन्हीं दो लोगों का एक होना स्वीकार कर सकते हैं तो अलग होना स्वीकार करने में हमें दिक्कत क्यों होती है?

आज से कुछ वर्ष पहले तक भारत जैसे देश में, अगर मुस्लिम समुदाय को छोड़ दिया जाए तो तालाक या तो उच्च वर्ग में होता था या फिर एकदम ही लोअर क्लास में महिलायें या पुरुष एक-दूसरे को छोड़कर किसी और के साथ रहने लग जाते थे। मिडल क्लास में अगर किसी महिला का पति उसे छोड़ देता था (तब मिडिल क्लास महिलाओं के मन में अपने पति को छोड़ने का विचार दूर-दूर तक नहीं आता था) तो उस महिला प्रति लोग बहुत सहानुभूति रखते थे और पूरे समाज की यह कोशिश होती थी कि जितना भी मान-मनौल करना पड़े, लड़के को इस बात के लिए मना लिया जाए कि वह उस लड़की को न छोड़े। कोई इस बात को उस लड़की से पूछने की जहमत तक नहीं उठाता था कि वो उस आदमी या उसके परिवार के साथ खुश भी रह रही है कि नहीं। अगर शादीशुदा जीवन में दो लोग एक साथ रह रहे हैं तो परिवार की मरजाद बनी रहती थी।


अब समय बदल गया है। लड़कियों को आजादी मिली, वो पढ़ी-लिखीं, अपना सही-गलत समझने लगी हैं और अब अपने फैसले भी ले रही हैं। तालाक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बात एक तरफा नहीं की जा सकती है। आज से कुछ दशक पहले अगर लड़के को भी उसके मन मुताबिक लड़की नहीं मिलती थी तो वो भी परिवार और समाज के दबाव में उस रिश्ते को बेमन निभाते चला जाता था। अब लड़के भी परिवार और समाज के दवाब से अलग शादी करने, शादी न करने या फिर डिवोर्स लेने जैसे फैसले भी करने लगे हैं। आज जब एलिट क्लास के बाद भारत के आम मिडल क्लास परिवारों में तालाक की घटनायें धीरे-धीरे बढ़ती जा रही हैं, तो यह हमारे लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है; शायद हजारों वर्षों की परंपरा ढह रही है इसलिए ऐसा हो रहा होगा। मगर क्या डिवोर्स सचमुच इतना गलत है? अगर दो लोगों को यह लगता है कि वो अब साथ नहीं रह सकते तो उनका अलग-अलग खुश रहने का प्रयास करना बुरा है?

दुनिया के सबसे खुश देश फिनलैंड और दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में सौ में से पचास शादियाँ डिवोर्स के रूप में समाप्त होती हैं। भारत में यह प्रतिशत अभी तक बहुत ही कम है। भारत में एक हजार शादियों में केवल एक प्रतिशत में डिवोर्स होता है। तो प्रश्न यह उठता है कि क्या डिवोर्स ले लेने से हमारी सामाजिक संरचना दरक कर टूट जाएगी; क्या हमारी अर्थव्ययस्था पिछड़ने लगेगी, या फिर हमारा देश ही नेस्तनाबूद हो जाएगा। इसका जवाब है— ऐसा कुछ नहीं होगा। हमारे समाज में स्वतंत्रता जितनी बढ़ेगी, हमारे निर्णय लेने की क्षमता में उतना ही इजाफा होता जाएगा। अपना करिअर चुनने का फैसला हो, अपना जीवनसाथी चुनना हो, किसी विचार से असहमति हो या फिर तालाक लेने जैसे अहम निर्णय ही क्यों न हों, हम जितने मेच्योर होते जायेंगे, हमारी दृष्टि उतना ही दूर तक देख पाएगी और हम अपना नफ़ा-नुकसान उतना ही ज्यादा समझ पायेंगे।

मुझे याद है कि आज से डेढ़-दो दशक पहले गाँव या फिर छोटे शहरों में लड़कियाँ दुपट्टे वाली ड्रेस नहीं पहनती थीं, तो इस तरह की बातें होने लगती थीं जैसे उसने कितना बड़ा अपराध कर दिया हो। आज मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अगर कुछ घरों को अपवाद के रूप में छोड़ दिया जाए तो इस बात से किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि किसी लड़की की देह पर दुपट्टा है भी कि नहीं। अन्तर्जातीय विवाह को समाज में स्वीकार करने की क्षमता वृद्धि देखी गई है। तालाक के मामले में अभी हमारा समाज नवजात है, यह हमारे लिए संक्रमण काल है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ महिलायें तालाक के नाम पर मैनटेनेंस के रूप में ऊल-जुलूल माँगे रखती हैं और लड़के तथा उसके परिवार को बदनाम करने से लेकर दहेज उत्पीड़न के केस में भी धकलने का प्रयास करती हैं। मेंटेनेन्स के नाम पर बेतुकी माँगें अस्वीकार्य हैं। मैन्टेनेन्स के नाम पर आज जो काम इक्का-दुक्का लड़कियाँ कर रही हैं, कुछ दशक पहले विवाह के नाम पर ऐसा ही कुछ, किसी दूसरे रूप में, बहुतायत में लड़के और उनके परिवार वाले लड़की और उनके परिवार के साथ करते थे। आज समाज में परिवर्तन आ रहा है, हम बराबरी की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में अपने मन से रिश्ता चुनना और छोड़ने जैसे फैसले को बुरा नहीं समझना चाहिए। हाँ चाहे रिश्ता जोड़ना हो या तोड़ना हो, एक-दूसरे को दोनों चीजों के लिए समय जरूर देना चाहिए। जिस दिन इस बात को समाज सहजता से स्वीकार करने लगेगा लोगों का जीवन और भी आसान हो जाएगा।

इस लेख के बारे में आपकी क्या राय है हमें जरूर बतायें।

A MUST WATCH MOVIE -- SOOKSHMDARSHINI (सूक्ष्मदर्शिनी)

 

पाँच में साढ़े चार (4½*)

सूक्ष्मदर्शिनी एक मलयालम फिल्म है जो अभी हाल ही में डीजनी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हुई है। मूवी काफी रोचक है और हॉटस्टार पर हिन्दी में भी उपलब्ध है। यह एक मर्डर मिस्ट्री है लेकिन आपको फिल्म खत्म होने के लगभग आधे घंटे पहले यह एहसास होगा कि इस फिल्म में किसी का मर्डर हुआ है। कहानी काफी कसी हुई है और हिन्दी फिल्मों की मर्डर मिस्ट्री के विपरीत आप इसमें कभी भी यह अंदाजा नहीं लगा सकते कि फिल्म में आगे क्या होने वाला है।



फिल्म की कहानी शुरू होती है एक आम मिडिल क्लास सोसाइटी से। उस सोसाइटी के लगभग सारे परिवार एक वाट्स ऐप ग्रुप से जुड़े हुए हैं। अंटोनी और उसके परिवार को इस फिल्म की कहानी का केंद्र बनाया गया है। एंटनी किसी इन्श्योरेन्स कंपनी में एजेंट की नौकरी करता है और उसकी पत्नी प्रियदर्शिनी भी नौकरी की तलाश में है। उन्हीं के मोहल्ले का एक परिवार विदेश से इंडिया आता है और यहीं बसने की बात करता है। उस परिवार में मैनुअल अपनी बीमार माँ के साथ रहने आता है।

मैनुअल के माँ को भूलने की बीमारी रहती है और उनकी दवाइयाँ चलती रहती हैं। प्रियदर्शिनी की खिड़की मैनुअल के घर की तरफ ही खुलती है और उसे मैनुअल की कुछ गतिविधियाँ संदेहास्पद लगती हैं। मैनुअल की माँ का भूलने की बीमारी के कारण उनका अक्सर इधर-उधर खो जाना और मैनुअल का रवैया दोनों प्रियदर्शिनी को अजीब लगते रहता है। जितनी उत्कंठा से प्रियदर्शिनी मैनुअल के बारे में पता लगाने का यत्न करती रहती है, पूरी फिल्म में आपकी भी जिज्ञासा इस बात को लेकर बनी रहेगी कि फिल्म में पीछे क्या हुआ, अभी क्या चल रहा है और आगे क्या होने वाला है?



ये तो बात हुई फिल्म की कहानी की। ऐक्टिंग लगभग सभी की दमदार है; चाहे वो प्रियदर्शिनी का किरदार निभा रही ‘नज़रिया नज़ीम’ हों, मैनुअल हो या फिर मैनुअल की भूलने वाली माँ। आमतौर तेलुगु, तमिल और मलयालम फिल्मों से हम जिस तरह के मनोरंजन की उम्मीद करते हैं, यह फिल्म उन सभी पैमानों पर खरी उतरी है। मेरी तरफ से इस फिल्म को पाँच में से साढ़े चार स्टार दिए जा सकते हैं। अगर आपके पास भी डीजनी प्लस हॉटस्टार का सब्स्क्रिप्शन है तो आप भी ढाई घंटे की इस मूवी का आनंद ले सकते हैं।

Friday, January 24, 2025

THE SABARMATI REPORT

 

द साबरमती रिपोर्ट 2024 मे रिलीज हुई। यह फिल्म फरवरी 2002 मे गोधरा में ट्रेन में जला दिए गए कार सेवकों की कहानी या रिपोर्ट जो कह लें उसे उजागर कर रही है। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह उस समय अंग्रेजी मीडिया हिन्दी मीडिया को कोई महत्व नहीं देता था।

गोधरा ट्रेन हादसे के बारे में पहले से ही सबको पता है लेकिन फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह इंग्लिश मीडिया ने उस समय सच्चाई को छिपाने की कोशिश की और यहाँ फिल्म के लीड रोल में अभिनेत्री ऋद्धि डोगरा जो कि फिल्म में मणिका राजपूत का चरित्र कर रही हैं उन्हें यह बोलते दिखाया गया है कि ‘पत्रकारिता केवल फैक्ट दिखाना ही नहीं  है, बल्कि यह कोटेक्स्ट और बैलेंस है।’

यह कहानी घूमती रहती है कि कहानी के नायक विक्रांत मेसी के आस पास जो इस फिल्म में समर नाम के एक हिन्दी संवाददाता और कैमरामैन की भूमिका में हैं। वो गोधरा ट्रेन हादसे की ग्राउन्ड रिपोर्टिंग करने जाता है और वहाँ वो जो देखता है उसे जनता के सामने लाना चाहता है और उसके इस प्रयास को तथाकथित अंग्रेजी न्यूज चैनल वाले असफल कर देते हैं। इसके बाद उसे शराब की लत लग जाती है और फिर फिल्म में एंट्री होती है एक  और लीड रोल राशि खन्ना की जो इस फिल्म में अमृता गिल नामक पत्रकार का रोल निभा रही हैं। सच्चाई को सामने लाने के लिए दोनों की जद्दोजहद शुरू होती है और काफी सालों बाद उन्हें जीत मिल जाती है।

फिल्म कि कहानी काफी धीमी लगती है। अभी इस फिल्म के बनाए जाने का कोई मतलब समझ नहीं आता है। विक्रांत मेसी ने सेक्टर 36 और टवेल्थ फेल में जैसी ऐक्टिंग कर चुके हैं उस लिहाज से इस फिल्म में उनकी ऐक्टिंग भी काफी कमजोर दिखी है। राशि खन्ना के कैरिक्टर को तो काफी मजबूत दिखाया गया है लेकिन उनकी ऐक्टिंग भी निराश करती नजर आती है। इस फिल्म में सबसे दमदार ऐक्टिंग ऋद्धि डोगरा की है। डोगरा की ऐक्टिंग के अलावा इस फिल्म में और कोई चीज ऐसी नहीं है जो दर्शकों से फिल्म देखने की अपील कर सके।

मेरी तरफ से इस फिल्म को पाँच में से डेढ़ सितारे काफी हैं।   

Wednesday, January 22, 2025

गोदान

 

गोदान हिन्दी के महानतम उपन्यासों में से एक है। इस एक उपन्यास में उस समय के ग्रामीण जीवन की लगभग सारी समस्याओं को बेहद जीवंतता के साथ प्रस्तुत किया गया है। किसानों के ऊपर बढ़ते कर्ज, समाज की झूठी मरजाद की रक्षा, लगान की व्यवस्था, जातधरम का आडंबर, समाज में महिलाओं की स्थिति, पुलिस और मुकदमें से लोगों में व्याप्त भय, ये सभी सामाजिक समस्याएं तो उपन्यास में प्रमुखता से हैं ही साथ ही एक नायक का कुछ छोटी-मोटी चोरी या बेईमानी कर लेना, पिता-पुत्र के बीच पीढ़ियों की सोच में टकराव, अनैतिकता का भास होते हुए भी कुछ प्रसंगों में किसी स्त्री-पुरुष के बीच आकर्षण हो जाना, ये कुछ ऐसे मनोवैज्ञानिक पहलू हैं जिसे प्रेमचंद ने बहुत ही बारीकी से उजागर किया है।


यह उपन्यास प्रेमचंद का अंतिम प्रकाशित उपन्यास है; और इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन का अनुभव, गांधीवादी विचारधारा का कुछ अंश, हँसी-विनोद और जीवन के तमाम संघर्षों को एक साथ एक कसे हुए कथानक के साथ प्रस्तुत कर दिया है। हालाँकि इस उपन्यास को ग्राम्य जीवन का महकाव्यातकम उपन्यास कहा गया है, लेकिन इसमें मिस्टर मेहता, राय साहब, ओंकारनाथ, मिस्टर खन्ना और मिस मालती आदि कुछ चरित्रों के माध्यम से शहरी चकाचौंध और तत्कालीन शहरी जीवन में व्याप्त आपाधापी का भी विशद चित्रण देखने को मिलता है।

भाषा-शैली के लिहाज से यह उपन्यास अपने स्वभाव के अनुसार ही मालूम होती है। इस उपन्यास में आम जन की कहानी है और भाषा भी बिल्कुल आम जन की ही है। उपन्यास में लगभग सारे संवाद काफी यातार्थपरक हैं; लेकिन कुछ संवाद जैसे —— “एक मजदूर अमीर होता है तो वो किसान बनता है और जब एक किसान गरीब होता है तो वो मजदूर बन जाता है।” ऐसे हैं जो कहानी को और गति देते हैं घटनाओं को जीवंत बनाते नजर आते हैं।

चरित्रों की नजर से उपन्यास को देखा जाए तो उपन्यास की परिस्थियों के अनुसार सबसे मजबूत चरित्र धनिया का है। धनिया का बेटा गोबर भी आने वाली पीढ़ी में बदलाव के संकेत देता हुआ दिखाया गया है। मिस मालती स्त्री शशक्तिकरण की प्रतीक के रूप में जान पड़ती हैं, वहीं मिस्टर खन्ना की पत्नी को एक आदर्श भारतीय नारी की तरह प्रदर्शित किया गया है। होरी मरजाद की रक्षा करने के लिए अपनी जान तक भी दे सकता है; वहीं दातादीन, झींगुरी सिंह आदि कुछ ऐसे साहूकार हैं, जिन्हें किसानों का रक्त चूसने के बाद भी चैन नहीं पड़ता। उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा जान पड़ता है मानो समाज में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति का कोई न कोई प्रतिनिधि उपन्यास में मौजूद है।  

एक मजबूत कथानक, उत्कृष्ट चरित्र योजना, घटनाओं का क्रमिक विकास, चुस्त संवाद, यथार्थ से नजदीकी आदि उपन्यास के प्रत्येक तत्व के लिहाज से यह उपन्यास श्रेष्ठ जान पड़ता है। अगर आपने अभी तक यह उपन्यास नहीं पढ़ा है और पढ़ना चाहते हैं तो कमेंन्ट में बता सकते हैं।

 

 

Sunday, March 24, 2024

भारत को क्यों नहीं मिल पा रही UN सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट, कौन सी चीज आ रही है आड़े

 United Nation Security Council: साल 1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ था. जो कि साल 1918 में खत्म हुआ. दुनिया में युद्ध में काफी तबाही देखी इसलिए  आगे युद्ध ना हो इसके लिए साल 1929 में राष्ट्र संघ नाम का एक संगठन बनाया गया. लेकिन यह संगठन किसी काम नहीं आया और  1939 में दूसरा वर्ल्ड वाॅर शुरू हो गया. जो 1945 तक चला. इसके बाद गठन हुआ संयुक्त राष्ट्र संघ यानी यूनाइटेड नेशंस.


यह संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति आर्थिक विकास मानव अधिकार और सामाजिक प्रगति के लिए बनाया गया. यूनाइटेड नेशंस में 193 देश है. वहीं यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल में पांच स्थाई सदस्य हैं. भारत एक लंबे समय से सिक्योरिटी काउंसिल का स्थाई सदस्य बनने के लिए प्रयास कर रहा है. लेकिन सफलता मिल नहीं पा रही है. आखिर इसके पीछे क्या कारण है चलिए जानते हैं.

क्या है UN सुरक्षा परिषद?


संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र का सबसे अहम हिस्सा कहा जाता है. इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति सुरक्षा कायम रखने का जिम्मा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद किसी देश पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगा सकता है.किसी देश पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है. UN सुरक्षा परिषद अगर कोई प्रस्ताव जारी करता है तो उसे संयुक्त राष्ट्र के बाकी देशों को मनाना होता है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में कुल 15 सदस्य देश हैं. जिनमें 5 स्थाई देश हैं. तो वहीं 10 अस्थाई तौर पर शामिल होते रहते हैं. 


UN सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य


जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था. तभी इसके सुरक्षा परिषद में पांच स्थाई सदस्य बना दिए गए थे. जिसमें रूस संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम और चीन शामिल है. यह पांचो देश वह देश है जो सेकंड वर्ल्ड वॉर में एक साथ लड़े थे और जीते थे. इन सभी देशों के पास वीटो पावर होती है. जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र के किसी भी फैसले को यह रोक सकते हैं.  


भारत को क्यों जगह नहीं मिल रही?


दरअसल भारत को UN सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाने की मांग काफी समय से की जा रही है. कई मौकों पर दूसरे देशों ने भी इस बात का समर्थन किया है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य चीन भारत की राह में रोड़ा बन रहा है. चीन के पास वीटो पावर है. जब भी भारत को स्थाई सदस्य बनाने की मांग उठती है चीन उसे मांग को रोक देता है. 



इसको लेकर कई लोगों के और भी तर्क है. उनका कहना है कि कि भारत ने अभी भी नॉन प्रॉलिफरेशन ट्रीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और साथ ही व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि यानी सीटीबीटी पर साइन करने से मना कर दिया है. यह भी एक वजह है. 



तो वहीं कुछ लोगों का मानना है कि भारत ही नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट लेने के लिए कई और देश भी लाइन में लगे हुए हैं.  जिनमें ब्राजील, जापान और जर्मनी शामिल हैं. इसलिए अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि भारत को जगह देनी है या नहीं. 



Thursday, March 14, 2024

भारत में हिन्दूवाद का पुनः उदय

 

भारत में हिन्दुवाद का पुनः उदय


कुछ लोगों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में हिन्दुवाद का फिर से उदय हो रहा है. इस विषय पर हम लगातार सीक्वेंस में बातें करते रहेंगे इसलिए आप जहाँ कहीं भी हमें पढ़ या सुन रहे हैं वहाँ हमें सब्सक्राइब और फॉलो जरुर कर लें.


इस कहानी में हम आज के डेट से पीछे जाते हुए घटनाओं को समझेंगे. सबसे पहली घटना का जिक्र करते हुए हम 22 जनवरी 2024 की तारीख पर बात करते हैं. ये वो दिन था जब भारतियों की चिर प्रतीक्षित इच्छा पूरी हुई. हालाँकि कुछ लोग मेरी इस बात से सहमत नहीं भी हो सकते हैं. उनका यह तर्क हो सकता है कि भारतीय मुसलमान ऐसी प्रतीक्षा में कभी  नहीं थे. हो सकता है उनकी इस बात में सच्चाई हो लेकिन इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता है कि एक बहुत बड़ी भारतीय आबादी इस घडी की प्रतीक्षा कर रही थी. भारत भूमि को सनातन भूमि कहा जाता है. और सनातनियों के सबसे बड़े आदर्श भगवान् श्री राम का जन्म स्थल अयोध्या था. वहाँ भगवान राम का मंदिर भी था लेकिन 500 वर्ष पूर्व कुछ आक्रान्ताओं ने उस मंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद का निर्माण करवा दिया था.



ये वो दौर था जब अयोध्या ही नहीं पूरे विश्व में हिन्दू मंदिर तोड़े जा रहे थे. भारत के अलावा यह वियतनाम कम्बोडिया जैसे एशियाई देशों में भी हो रहा था. एक कहावत है न समय सबसे बलवान होता है और एक और दूसरी कहावत यह है कि सत्य की जीत होती है. इन सबमें सबसे ज्यादा सटीक कहावत यहाँ पर यह है कि भगवान् के घर देर है अंधेर नहीं है.

9 नवम्बर 2019 का वो दिन था जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया था कि अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर बनेगा. अयोध्या में राम मंदिर बनवाना भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख लक्ष्यों में एक था जिसमें न्यायपालिका ही सबसे बड़ी अड़चन नजर आ रही थी लेकिन इस माननीय सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मंदिर बनने का रास्ता लगभग साफ़ हो गया था. लेकिन 9 नवम्बर 2019 और 22 जनवरी 2024 से पहले आपको एक और तारीख याद रखनी होगी. वो तारीख थी 6 दिसम्बर 1992.

आज जिस मंदिर के बनने पर हम जश्न मना रहे हैं हो सकता है हममें से बहुत सारे लोगों का उस दिन जन्म भी न हुआ हो. लेकिन भारत में हिन्दुवाद के पुनर्जागरण में वह तारीख तो हमें याद रखना ही होगा साथ ही उस तारीख से जुड़े एक ऐसे व्यकित को भी सलाम करना होगा जो उस दिन अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं होते तो आज शायद हम राम मंदिर नहीं देख पाते. वो थे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह.

जब कार सेवक मस्जिद की गुम्बद पर चढ़ रहे तो उन्हें लगातार भारतीय गृह मंत्रालय से फोन आ रहा था और उनपर दबाव बनाया जा रहा था कि कार सेवकों को मस्जिद की तरफ जाने से रोकें. उन्होंने कहा कि वो कार सेवकों को रोकने के लिए जितने पुलिस बल हो सकते हैं लगा चुके हैं और इससे ज्यादा वो कुछ नहीं कर सकते. उनके ऊपर दबाव बनाया गया कि वो कार सेवकों पर गोली चलवायें. उन्होंने ऐसा करने से बिलकुल मना कर दिया . उन्होंने अपनी कुर्सी दाव पर लगा दी थी. जब कार सेवक एक गुम्बद तोड़ चुके थे तब गृह मन्त्राल से फोन आया था कि आपको पता है कार सेवक गुम्बद पर चढ़ चुके है. इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि आपको एक कदम पीछे की जानकारी है कार सेवक एक गुम्बद भी तोड़ चुके है. कल्याण सिंह की सरकार राष्ट्रपति द्वारा बर्खाश्त कर दी गयी.

उनका ध्येय साफ़ था कि भारत की इस सनातनी भूमि पर राम की जन्मभूमि के राम मंदिर होना ही चाहिए. अभी कल्याण सिंह को भारत रत्न देने की भी मांग बहुत जोरों पर है. भाजपा के कई विधायक और सांसद कल्याण सिंह को भारत रत्न देने की मांग कर चुके हैं.

लेकिन 06 दिसम्बर 1992  को जो अयोध्या में हुआ उसे तो सभी जानते हैं हम आपको उसके एक दिन पहले की बात बताते हैं. दिन 05 दिसम्बर 1992 स्थान लखनऊ, वहां देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी भाषण दे रहे थे. उन्होंने अपने भाषण में कहा था. “कार सेवा रुक नहीं सकती. यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश में है कि कार सेवा हो सकती है. वहाँ भजन कीर्तन होगा. लेकिन उस स्थान पर नुकीले पत्थर निकले हैं उन्हें समतल करना होगा. उसके बाद वहाँ यज्ञ का आयोजन होगा. नुकीले पत्थर को समतल करने का तात्पर्य क्या था यह उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट नहीं किया था. लेकिन उसके ठीक अगले दिन अयोध्या में जो हुआ उसका साक्षी पूरा विश्व बना और उसे हम हिन्दू पुनर्जागरण की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देख सकते हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी जी का जिक्र इस कड़ी में आगे भी आता रहेगा. 21 वीं सदी वास्तव में हिन्दुओं की और हिन्दुस्तानियों की सदी होने वाली है. इसकी झलक आप देख सकते हैं कि देश विदेश में हिंदुस्तान का नाम हो रहा है और हिन्दू मंदिरों का निर्माण जोरों पर है.

इस कड़ी को हम यूँ ही आगे बढ़ाते रहेंगे लेकिन आप सबसे लाइक, कमेंट, शेयर और सब्सक्राइब की उम्मीद तो हम कर ही सकते हैं. आप यूँ ही अपना प्यार बनाये रखिये. बहुत जल्द और अच्छी जानकारी के साथ मिलते हैं अगले एपिसोड में.

Monday, January 1, 2024

अब ट्रेन में मिलेगा जीरो वेटिंग लिस्ट

 अगर आप भी ट्रेन टिकट में मिलने वाली वेटिंग लिस्ट से परेशान हैं तो यकीन मानिए भारतीय रेलवे को आपका पूरा ख्याल है। रेलवे बहुत कुछ ऐसा करने वाला है कि भारत में वेटिंग लिस्ट जीरो रहेगी। जी हां आपने बिलकुल सही सुना वेटिंग लिस्ट जीरो, माने जब मन हो टिकट कराओ और जहां मन हो वहां चले जाओ। लेकिन, अब इतनी बड़ी बात है तो लेकिन तो लगेगा ही। 

लेकिन के बारे में बाद में बात करेंगे पहले रेलवे के इस प्लान को अच्छी तरह समझ लेते हैं। जिस तरह से आपको पिछले दस सालों में सड़कों में परिवर्तन देखने को मिला है कुछ वैसा ही आने वाले समय में रेलवे में भी देखने को मिलेगा। 

जीरो वेटिंग के लिए सरकार ने रेलवे पर एक लाख करोड़ केवल ट्रेन की खरीददारी पर खर्च करने का प्लान बनाया है। और इसकी घोषणा खुद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव जी ने की है।

वर्तमान में भारतीय रेल प्रतिदिन 10754 ट्रिप लगाती है जिसे 3000 और बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। फिलहाल एक साल में भारत में कुल 700 करोड़ यात्री सफर करते हैं जो 2030 तक 1000 करोड़ हो जाने की संभावना है। 

नई ट्रेनों के लिए नए ट्रैक चाहिए होंगे इसलिए फ्रेट कॉरिडोरस को जल्दी जल्दी तैयार कर उसे चालू करने का प्लान भी इसमें शामिल है।

अब शुरू में हमने जो लेकिन लगाया था उस लेकिन में ये है कि ये सारा काम fased मैनर में होगा जिसे पूरा होने में एक दशक का समय लग सकता है। मगर उसमें भी एक लेकिन ये है कि पीक सीजन को इसमें अपवाद रखा गया है। मतलब दीपावली और छठ के समय जब ज्यादा लोग ट्रेन में सफर करते हैं उस समय हो सकता आपको तब भी कन्फर्म टिकट न मिल पाए। बाकी अगर आने वाले समय में ऐसा होता है तब हम सबके लिए ट्रिप प्लान करना आसान होगा और जब इच्छा जहां इच्छा वहां निकल पड़ेंगे।

Sunday, December 31, 2023

बिहार में रातों - रात गायब हो गया तालाब

 आज की बात शुरू करें उससे पहले आपलोग ये देखें। बकरी चोरी, चप्पल चोरी के ये दृश्य तो आपने पंचायत वेब सीरीज में देखा ही होगा। मगर बिहार में चोरों का अलग ही स्तर है। बकरी और चप्पल जैसी चीज तो अब चोरी की गिनती में ही नहीं आतीं। यहां कभी पुल गायब होते हैं, कभी टावर उड़कर आसमान में समाहित हो जाता है, कभी रेल का इंजन सुरंग के रास्ते भाग निकलता है और कभी 3 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रैक ही लापता हो जाता है। और वहां की ट्रेन कह उठती है, "मेरे पैरों तले ट्रैक खिसक गई"। खैर मजाक अलग बात है इसलिए मैं मीम की बातें करूंगा। आपलोग मीम देखते होंगे, जिसमें लिखा आता होगा किड्स, फिर अगले लेवल में मेन और फिर उसके अगले लेवल में लीजेंड्स। तो बिहार में चोरी का वही लेवल चलता है। यहां लोगों ने कुछ अलग करने की ठान ली है। उसी कड़ी में ये नई खबर आई है। रातों-रात तालाब गायब! 12 बीघे में फैला तालाब रात भर में गायब हो गया। जब भूमाफियाओं ने तालाब को धीरे-धीरे भरना शुरू किया था तो स्थानीय लोगों ने शिकायत की थी। पुलिस आई और माफियाओं के थोड़े सामान भी जब्त कर लिए गए। मगर फिर पता नहीं क्या हुआ रात भर में ही तालाब गायब कर उसके ऊपर मिट्टी पाट दी गई और कुछ झोपड़ियां भी खड़ी कर दी गईं। स्थानीय लोगों की शिकायत पर FIR तो दर्ज की गई है लेकिन आपको बता दें कि दरभंगा में तालाब गायब होने का यह कोई पहला मामला नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में जहां दरभंगा में 119 तालाब थे वहीं अब वहां केवल 85 तालाब ही बच गए हैं। हालांकि ये  रिपोर्ट कितनी सही है, ये कहा नहीं जा सकता। बाकी अभी गायब हुए तालाब के बारे में पता चला कि पुलिस के वहां पहुंचने से पहले भू माफिया वहां से भाग निकले थे। अब आगे क्या होता है ये तो देखने वाली बात है।

भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष : किसे क्या हासिल हुआ?

  हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच आठ मई 2025   के बाद हुए सैन्य संघर्ष के बाद दस मई को दोनों पक्षों की ओर से सीजफायर की घोषणा कर दी गई। दस म...